Thursday, December 20, 2018

चहरे कि चमक, आंखों का तेज़ और होंठों कि हंसी,
इनकी आड में सपनों के टुटने कि आवाज़ क्या किसी ने सुनी ?

उनसे उस दिन एक आखरी बार मिल भी लेती तो क्या बदल जाता,
जो खो गया था क्या वो एक बार फिर मिल वापस जाता ?

Monday, December 10, 2018

ख्यालों का दायरा इतना बड़ा था कि,
इर्द गिर्द दीवारे चार थी
फिर भी आसमान सामने खड़ा था।

Wednesday, November 14, 2018

वो क्या था जो पहले से अब थोड़ा कम था?
तु था या तेरे गुज़र जाने का ग़म था।

#बचपन

Sunday, November 11, 2018

जब यहां आई थी तब कमरे का एक कोना था,
और जाने-पहचाने लोग कम।

घर वापस जाने का उत्साह ज्यादा,
और यहां रहने का कम।

अब भी वही कमरे का एक कोना हैं,
और आज भी जाने-पहचाने लोग कम।

पर अब यहां ज्यादा रहती हु और वहां कम,
अब इसे ज्यादा घर कहती हु और "घर" को घर कम।

Friday, October 19, 2018

कुछ बातें यादों में बदल गई,
और कुछ यूं ही अनकही रह गई।

Sunday, October 7, 2018

बड़ी शान से कहते थे, "दिन में एक वो पल है, जो सिर्फ हमारा है।"
उस दिन तक......
जिस दिन यह अहसास हुआ कि उस पल में यादें भी तुम्हारी थी, और अब वो पल भी तुम्हारा है।

Friday, September 21, 2018

इस समंदर ने सुनी है कहानियां कई,
कुछ बीती कुछ नई।

#मरीन ड्राइव

Thursday, September 6, 2018

टूट तो इन्सान तब जाता है,
जब जो नहीं बनना था वहीं बन जाता हैं।

खुली आंखों से नज़र आने वाला ख्वाब,
कभी ना मिलने वाले उन सवालों का जवाब,
अमावस्या की रात निकले चांद की रौशनी,
और उसे खोने की मायुसी।

Monday, August 27, 2018

मृगतृष्णा की परछाई से क्यो अपना चेहरा छुपाते हो,
भविष्य की त्यारी कर रहे हो या भविष्य से घबराते हो।

पहले 'माॅ' कहने पर जवाब 'हाॅ'‌ में आता था,
अब वो पुकार खाली चली जाती है।

Friday, August 24, 2018

जो हमें लगा कि वह भूल गए वो उन्हें याद रह गया,
जो जुबान न कह सकी वह उन खतों का एक लफ्ज़ कह गया।

Monday, August 20, 2018

पुरानी यादों को अब खंगालकर करोगे ही क्या,
जो ढूंढ रहे हो वह अब बचा है क्या?

Thursday, August 16, 2018

शहर की चकाचौंध में चांदी की चमक कहीं खो गई,
पायल की छनक "लोग क्या कहेंगे" के डर से एक कोने में दुबक कर सो गई।

Wednesday, August 15, 2018

तुम्हें छुकर गुज़र जाना इतना मुश्किल होगा इसकी खबर न थी,
तन्हाइयों में भी तुम्हारा अहसास था और दिन में भी होश की खबर न थी।

Monday, August 13, 2018

मैंने जिसे प्यार से बांधने कि कोशिश की,
वह बन्द पिंजरे का पंछी न था।
उसकी मंजिल तो आसमानों में थी,
वो ज़मिन पर रुकने वालो में से न था।