क्या रास्ता इतना धुंधला था, कि उस पर चलना मुश्किल था।
या डर का साया इतना काला था, कि आगे बढ़ना मुश्किल था।
आज पहली बार चांद को घटते देखा है, दिनों को क्षणों में गुजरते देखा है।
मन की असमंजस में खो कर, दिन ब दिन खुद को नष्ट होते देखा है।
सर्वश्रेष्ठता के गुरुर में आज तो जी लोगे, भविष्य में, अज्ञानता के आभास का कड़वा घुट क्या पी लोगे ?