थोड़ा ठहरी तो साया भी नज़र नहीं आया,
अपनी उलझनों का कोई किनारा भी नज़र नहीं आया।
उलझनों भरा अंधेरा इतना गहरा था कि,
मुझे खुद में और अंधेरे में फर्क नज़र नहीं आया।
Saturday, March 30, 2019
Sunday, March 3, 2019
अब माँ बुलाएगी तो भागुंगी नहीं.. माँ कि गोद में सर रखकर थोड़ा रुक जाऊंगी,
पापा कि ओर भी प्यार से देख थोड़ा थम जाएंगी।
किसी के कंधे पर सर रखकर रोने से पहले थोड़ा रुक जाऊंगी,
अब तो खिलखिला कर हंसने से पहले भी थोड़ा थम जाएंगी।
आज के बाद हर खुशी को कुछ देर रुककर जी जाऊंगी,
क्योंकि शायद कुछ दिन बाद यह सांसे रुक जाएगी और मैं थम जाऊंगी।
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